इस वजह से ये औरते कपड़े पहन कर नहाती हैं।

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तो आ गए आप , कैसे हो?

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दोस्तों स्वागत है आपका आपके अपने टेक्निकल दोस्त के पेज पर। दोस्तों आप अक्सर देखते होंगे की हम अपने घर या देश की बड़ी – बड़ी समस्याएँ तो हल कर लेते है, पर इन सभी के बीच साँस लेती कुछ छोटी पर बहुत जरुरी समस्याएँ छूट जाती है। ज़रा सोचिये अगर मैं आपसे कहुँ की आप सारी ज़िन्दगी कपडे पहनकर दुसरो को सामने नहाएंगे , तो शायद इस बात पर आप मुझे गाली दे और कही ज़्यादा खून ऊबल जाये तो बजा भी दे मुझे। पर यह दोस्तों ना ही कोई मजाक है और ना कोई कहानी। यह सच्चाई है उन लाखो औरतो की जो आज भी शर्म और लिहाज़ के ठेकेदारों के नीचे रोज बेशर्म होने पर मजबूर है। जिन्हे लिए घरो में एक बाथरूम होना आज भी किसी सपने से कम नहीं है। क्या यह सब इसलिए क्योकि यह औरते समाज के उस हिस्से से आती है जहॉ इन्हे इंसान समझने का भी कष्ट नहीं किया जाता। या इसलिए की समाज सिर्फ औरतो के कपड़ो और व्यवहार का ठेकेदार है उन्हीं basic facilities का नहीं , जो उन्हें इंसान बनती है। दोस्तों शायद यह कड़वी सच्ची को पीने में बहुत बुरा मह्सूस करेंगे मेरी तरह पर यह सच है की आज गांव में तहरीबन 55 % महिलाएं जानवरो की तरह झुण्ड में तालाबों में नहाती है, ना जाने कितनी ही अश्लील नज़रे और घटिया Comments के बीच। और यह खेल कोई आज , कल या परसो का नहीं बल्कि सालो से चलता आ रहा है। मुझे एक बात समझ में नही आती की एक ऐसा देश जहॉ औरतो के कपड़ो पर , उनकी जुबान पर और उनके चालचलन को इतना control किया जाता है , वहाँ उनके नहाने के इंतज़ाम पर थोड़ा – सा ध्यान क्यों नहीं दिया जाता। क्या आदमियों के सामने नहाना ठीक है? पर उन्हें अपनी शक्ल देखने पर  बदचलन होने तमगा दे दिया जाता है। यह कैसा दोगला समाज है दो एक और उन्हें कपडे उतरने को बोल रहा है और दूसरी और शक्ल छुपाने और आवाज दबाने पर जोर दे रहा है।

हालहीं में तैयार की गई एक रिपोर्ट के  जिसे VikasAnvesh Foundation  और  TATA Trust द्वारा तैयार किया गया है में, पांच राज्य झारखण्ड, ओडिशा , बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के 44 गांव की सभी महिलओं के इंटरव्यू से यह बड़ा खुलासा हुआ है। की  लगभग 60 से 80 % महिलाऍ झुंड में कपडे पहन कर गांव के किसी तालाब ले नदी में चुपचाप  सुबह – सुबह नहाने के लिए मजबूर है और इस पर भी इनकी समस्या यही खत्म होती लगभग रोज ही इन्हे नाहते वक़्त या घर जाते वक़्त अश्लील निगाहो और comments का सामना करना पड़ता है। इससे न केवल उनकी सुरक्षा बल्कि उनके स्वस्थ पर भी बहुत बुरा प्रभाव पद रहा है। कितनी घटिया और दोगलेपन की बात है की जहाँ हम अपनी औरतो को चार दीवारी में क़ैद रखते है उनके महान इज़्ज़त की रखवाली के लिए क्योकि हम उनके  भाई , बाप या पति नहीं बल्कि उनके मालिक बन जाते है और वो सिर्फ हमारे लिए किसी तिजोरी का सामान बन जाती है। जिनकी किसी और परेशानी पर ध्यान दिए बिना हमे उनकी रक्षा करनी है। 2011 Census के आंकड़े भी जोर – जोर से चिल्ला रहे है की आज भी भी लगभग 42 % भारतीय घरो में basic bathroom Facility भी नहीं है और सरकार स्वच्छ भारत अभियान में शायद बाथरूम जोड़ना भूल गई , अब जोड़ती भी क्यों जितना नाम toilets बनवाने में है उतना Bathrooms बनवाने में कहाँ।

दोस्तों अगर हम खुद को बहुत संस्कारी और इज़्ज़तदार मानते है, तो जब हमारी औरते खुले में नहाती या शौच करती है तो हमारी इज़्ज़त कहाँ चली जाती है। या सिर्फ इज़्ज़त उनकी शक्ल छुपाने और  आवाज दबाने तक ही रहती है। दोस्तों ऐसा क्यों है की जब भी बात औरतो की जरूरत या उनकी सुविधा की आती है तो हम आँखों वाले अंधे क्यों बन जाते है। और जब बात उनसे कुछ छीनने की आये तो आँखों की भी आँखें लौट आती है। इस बारे में सोचना जरूर।

तो बोलो जय माता दी।😊

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