मुहर्रम के बारे में ये बाते नही जानते होंगे आप।

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तो आ गए आप, कैसे हो?
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दोस्तों जैसा की आप सभी जानते है भारत अनेकता में एकता वाला देश है हम यहाँ सभी धर्मो  के त्यौहार और खुशियों को मानते है। चाहे को रंग उड़ाती होली हो या खून बहता मोहर्रम। सभी त्योहारों की यहाँ अपनी अहमियत है और सभी की अपनी खासीयत। चाहे वो भोले बाबा के नाम से पी गई भांग हो या मीठी- सी सेवईया। सभी का मज़ा हम भरपूर उठाते है और हर त्यौहार में दबा कर खाते है। त्यौहार तो एक बहाना है दरसल हमे तो एक मौक़ा चाहिए हुल्लड़बाजी करने का। कुछ अपनी फेकने का , कुछ किसी की लपेटने का। पर क्या यह सब Festival सिर्फ छुट्टियाँ मानाने या ठूस कर  खाने के लिए ही होते है? या इनमे कुछ और भी बात छुपी है और अगर हाँ , तो क्या? तो आप तो अपने दिमाग पर हल्का सा जोर भी मत डालो, मैं बताता हूँ न इनकी History से लेकर Future तक, मैं इसीलिए ही तो दुनिया में आया हूँ।

पूरी दुनिया में शायद ही इतने आँसू कभी बहे होंगे , जितने मातम मानते हुए करबला के मैदान में हज़रात ईमाम हुसैन की मौत पर बहे थे। महर्रम मुस्लिम समुदाय के ख़ास त्योहारों में से एक है। यह इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने की शुरआत करता है। मुहर्रम के दसवे दिन को अशुरा का दिन कहा जाता है। इस रोज मुस्लिम अपने तीसरे सिया ईमाम हुसैन बिन अली और उनके परिवार की शहादत पर मातम मनाते है जो करबला  के मैदान में शहीद हो गए थे। आज के दिन लोग मोहम्मद की याद में रोजा रखेंगे और शाम में शहरभर में ताज़िया निकलेंगे। मोहर्रम और इस्लामिक साल इबादत और उनकी कुर्बानियो को याद करते है। यह दिन है उनकी कुर्बानी को याद करने का जिन्होंने अच्छाई को बचाने के लिए अपनी जान की क़ुर्बानी दे दी।

दोस्तों यह सिर्फ एक त्यौहार नहीं है बल्कि एक ऐसा दिन है जिस दिन को हम बुराई पर अच्छाई की जीत को मानते है। इसलिए अगली बार किसी त्यौहार को सिर्फ सैर – सपाटे के रूप में ना देखना , कोशिश करना उसमे छिपे गहरे मतलब और सबक़ लो समझने की।

तो बोलो जय माता दी।

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